एक ड्राइवर की मौत

 

एम कोंडय्या हैदराबाद का एक आम व्यक्ति था, जो हर मध्य वर्गी की तरह परिवार की गुजर-बसर करने में जुटा था। 34 वर्षीय कोंडय्या टैक्सी चलाता था और अपने परिवार, खासतौर पर अपनी 6 और 10 वर्ष की बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए मेहनत कर रहा था। लेकिन, ये सपना 12 फरवरी को बिखर गया जब कोंडय्या ने आत्महत्या कर ली। अपनी नई कार Indica V-2, जो कोंडय्या Uber के लिए चलाता था, के कर्ज की किश्त कई महीनों से नहीं भर पाने के भारी तनाव में आकर उसने जहर खा ला लिया और अस्पताल में दम तोड़ दिया। हफ्ते भर में ही बंगलुरु में भी दो ड्राइवरों द्वारा भी Ola के ऑफिस के सामने आत्महत्या करने की कोशिश की खबरें आईं।

कोंडय्या की मौत को आसानी से आत्महत्या की एक और आंकड़ा मानकर भुलाया जा सकता है, लेकिन अगर थोड़ा आत्मविश्लेषण किया जाए तो ये घटना देश में फैल रही बड़ी बुराई की तरफ इशारा करती है। गौर से देखा जाए तो कोंडय्या को सिर्फ जहर ने नहीं मारा, उसकी मौत के लिए अनुपयुक्त वादे, अतिरंजित उम्मीदें, लालच और भ्रम जिम्मेदार थे। कोंडय्या कुछ सालों से टैक्सी चला रहा था, जब वो नए युग के कैब एग्रीगेटर के ज्यादा कमाई करने के प्रलोभन में आ गया। 8 महीनों तक Uber के लिए अपनी नई कार चलाने के बाद कोंडय्या सिर्फ कर्ज की किश्त और रोजमर्रा के खर्चे पूरे कर पा रहा था, उसकी कमाई परिवार और अपने खर्चों के लिए नाकाफी थी। आखिरकार, पैसों की तंगी और नाउम्मीदी के चलते कोंडय्या ने जिंदगी से ही मुंह मोड़ लिया। कोंडय्या की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या कोंडय्या खुद जिसने Uber के लिए कार चलाकर बेहतर जिंदगी के ख्वाब देखे या फिर उबर और Ola जैसी कैब-एग्रीगेटर कंपनियां जो देश में अपना कारोबार बढ़ाने के लिए ड्राइवरों को ऊंचे वादे कर रही हैं। तो क्या ये महज तथ्यों को बढ़ाचढ़ा कर बताना है या इसे धोखाधड़ी कहा जाए?

एक बड़ा संकट?

इस बात को और समझने के लिए बस अखबारों पर नजर दौड़ाने की जरूरत है। दिल्ली, बंगलुरु, हैदराबाद और देश के कई दूसरे शहरों में Ola और Uber जैसे कैब-एग्रीगेटर से जुड़े ड्राइवर इन कंपनियों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। कई शहरों में इन आंदोलनों की वजह से कंपनियों की सेवाओं पर काफी असर पड़ा है। ड्राइवरों की मांगे सरल हैं – वादा की हुई प्रोत्साहन राशि में बार-बार फेरबदल न किया जाए, घाटे वाली शेयर राइड्स न दी जाएं, दुर्घटना बीमा कराया जाए और 6 रुपये प्रति किलोमीटर के न्यूनतम किराए में बढ़ोतरी की जाए। साथ ही, ड्राइवरों ने ये भी मांग रखी की कंपनियों के नेटवर्क में नए ड्राइवर जुड़ने की सीमा तय हो, ताकि कमाई और ज्यादा न कम हो जाए।

देश में आंदोलन और धरना आम बात है और मीडिया में इन ड्राइवरों के आंदोलन को भी उतना ही महत्व मिला जितना दूसरी श्रमिक विवादों को दिया जाता है। लेकिन, कोंडय्या की मौत के बाद इस वाद की रूप-रेखा बदल गई है। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या कैब-एग्रीगेटर द्वारा जानबूझकर तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और झूठे वादे करने को अपराध माना जाए? क्या Ola और Uber की ओर से ऊंचे ख्वाब दिखाए जाना बस गलती थी या ये एक छल था जिसने देश के हजारों ड्राइवर की जिंदगी और सपनों को बिखेर के रख दिया?

पिछले कुछ सालों में कैब-एग्रीगेटरों ने अपने नेटवर्क से जुड़े ड्राइवरों की संख्या बढ़ाने के लिए धोखे का सहारा लिया। ड्राइवरों को हर महीने 1.5 लाख रुपये तक की भारी भरकम कमाई करने का लालच देकर देश में इन कंपनियों ने अपनी पकड़ मजबूत की। इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि 3 साल में ही Ola 5 अरब डॉलर की कंपनी बन गई और कमाई में उबर भी पीछे नहीं रही। शुरुआती दौर में, कंपनियों के नेटवर्क से जुड़े ड्राइवरों की चांदी हुई, उन्हें कई तरह के फायदे दिए गए। कुछ वक्त ऐसा भी था जब नेटवर्क पर सिर्फ कुछ घंटे हाजरी लगाने भर से ही ड्राइवरों को पैसे मिलते थे, चाहे सवारी मिली हो या नहीं। उस समय से लेकर जब ड्राइवर हर महीने 1 लाख रुपये की आसानी से कमाई कर लेते थे, आजकल जहां ड्राइवर हर रोज 18 घंटे कार चलाकर भी मुश्किल से 20,000 रुपये से 30,000 रुपये ही कमा पा रहे हैं। ड्राइवर हड्ड़ीतोड़ मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पहले के मुकाबले आधे पैसे ही मिल रहे हैं। अगर आप सोचें कि आपकी कमाई बढ़ने की बजाय सिर्फ आधी ही रह जाए, तो इसका अंजाम दु:खद ही होगा की नहीं?

Courtesy: Zee Biz

दुख की बात है कि ज्यादातर लोग इस धोखाधड़ी को लेकर बेखबर हैं या फिर उन्हें इससे कोई सरोकार ही नहीं है। आज भी, ड्राइवरों को ऊंचे वादे किए जा रहे हैं, ताकि वो नेटवर्क के साथ जुड़ जाएं। बेहतर भविष्य के लालच में ये ड्राइवर भी भारी कर्ज लेकर नई और बड़ी कारें खरीद लेते हैं। अनुमान के मुताबिक Ola और Uber के करीब 6-8 लाख ड्राइवर कर्ज के जोखिम में पड़ सकते हैं।

तो जिम्मेदार कौन

इस मामले की सबसे बड़ी समस्या दायित्व की है। अगर ड्राइवरों की कमाई में गिरावट आए और वो कर्ज न चुका पाएं तो इसका जिम्मेदार कौन है? अगर कल पूरा कारोबार ही ठप पड़ जाए तो उसका नुकसान कौन उठाएगा?

इस परिदृश्य की खास बात ये है कि देश में अपने नेटवर्क से लाखों ड्राइवरों को जोड़ने के बावजूद Ola और Uber पर कोई भी जिम्मेदारी या जवाबदेही नहीं बनती है। चतुराई से बनाए गए कॉन्ट्रैक्ट की मदद से ये कैब-एग्रीगेटर अपनेआप को सिर्फ तकनीक मुहैया कराने वाले बताते हैं न कि नियोक्ता। नियोक्ता न होने की वजह से इन कंपनियों पर अपने कर्मचारियों के रिटायरमेंट, प्रोविडंट फंड, ग्रैच्युटी, वैतनिक अवकाश, आदि का भार उठाने की जिम्मेदारी भी नहीं होती। बहुत थोड़े कर्मचारियों के अलावा, नेटवर्क से जुड़े ड्राइवरों को कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जाता है।

सबसे हैरानी की बात है कि इस मामले की ओर सरकार की बेपरवाही। ड्राइवरों के आंदोलन को किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं मिला। इस उद्योग से आकार और आजीविका की बड़ी संख्या को देखते हुए ये चौंकाने वाला है। अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन से भारतीय प्राधिकारी कुछ सबक ले सकते हैं। पिछले महीने फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) ने Uber पर ड्राइवरों को जोड़ने के लिए झूठे वादे करने के आरोप में 2 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है। Uber पर आरोप था कि ड्राइवरों को आकर्षित करने के लिए कंपनी ने हर घंटे या वार्षिक कमाई को बढ़ा-चढ़ाकर बताया। जुर्माने की राशि उन ड्राइवरों को मिलेगी जो कंपनी के गलत वादों के चलते नेटवर्क से जुड़े। अलग-अलग मीडिया में विज्ञापनों में कमाई को बढ़ाकर बताना और वार्षिक कमाई के आंकड़े को ज्यादा दिखाने को लेकर फेडरल ट्रेड कमीशन को आपत्ति थी और कमीशन को लगा कि कंपनी पर गलत जानकारी देने के लिए जुर्माना लगना चाहिए। अमेरिका के इस मामले में Uber ने इस निर्णय को मान लिया। भारत में जिस तरह से गलत जानकारी के बूते पर ड्राइवर जोड़े जाए रहे हैं, अगर उस तरीके को अमेरिका या यूरोप में अपनाया जाए तो कैब-एग्रीगेटर को ड्राइवरों की ओर से ही बड़ी संख्या में मुकदमों का सामना करना पड़ता।

Courtesy: DNA India

एग्रीगेटर और मीडिया की ओर से तकनीक की मदद से बड़े बदलाव की तस्वीर बनाई गई थी जिसमें टैक्सी कारोबार की कार्यक्षमता में भारी बढ़ोतरी होने से टैक्सी का किराया ऑटो से कम दिखाया गया था। सच्चाई ये है कि कम किराया ड्राइवरों को अलाभकारी किरायों की भरपाई के लिए सब्सिडी दी जाने की वजह से था। ड्राइवरों का नेटवर्क प्रलोभनों के बैसाखी पर टिका था। अब बिना किराया बढ़ाए ये बैसाखी हटा ली गई है, नतीजतन ड्राइवर की कमाई में भारी गिरावट आई है।

अंत में, कोंडय्या कुमार की आत्महत्या से इस उद्योग और सरकार की आंखे खुल जाने चाहिए। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि किस कुछ सालों में ही टैक्सी उद्योग का तेजी से विस्तार हुआ है और इसमें सिर्फ दो ही कंपनियों का दबदबा है और ये हीं नियम तय कर रही हैं। ऐसे नियम-कानूनों की जरूरत है जो गलत जानकारी के आधार पर उत्पाद बेचने पर रोक लगा सके, किराए सही स्तर पर लाए और ये सुनिश्चित करे कि कारोबार के किसी भी घटक – ड्राइवर से लेकर ग्राहक, के साथ नाइंसाफी न हो। पिछले साल वाणिज्य मंत्रालय ने प्रेस नोट 3 पेश किया था, जिससे e-commerce उद्योगों में दाम पर प्रभाव और लागत से कम दाम पर उत्पाद बेचने पर रोक लगाई जा सके। नियामक की ओर इस तरह का दखल टैक्सी उद्योग में होना भी जरूरी है।

इस मामले की अनदेखी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कैब-एग्रीग्रेटर की किसी भी तरह की गारंटी के बिना ही इन ड्राइवरों ने बैंकों और एनबीएफसी से कर्ज लिए हैं। अगर कुल में से सिर्फ 5 फीसदी ड्राइवर ही अपना कर्ज नहीं चुका पाते हैं और ये कर्ज एनपीए में बदल जाते हैं, तो ये अमेरिका में साल 2007 में आए सब-प्राइम संकट की तरह एक बड़ी समस्या का रूप ले सकती है। अगर ये सुनिश्चित किया जाए कि कोंडय्या जैसे बाकी ड्राइवर भी घातक कदम उठाने के लिए मजबूर न हों, ये सिर्फ कैब-एग्रीगेटर के लिए नहीं बल्कि समाज के लिए भी अच्छी खबर होगी।

उम्मीद है कि बात बहुत बिगड़ने के पहले संभल जाएगी और कोंडय्या की आत्महत्या एक अपवाद रहेगा न कि चलन। अंत में, कोंडय्या के परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और उन लाखों ड्राइवरों के लिए भी जो गुजारा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शाश्वत चतुर्वेदी

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